विसर्ग सन्धि किसे कहते है? विसर्ग सन्धि के नियम परिभाषा एवं उदाहरण What is Visarga Sandhi? Definition and examples of dissolution treaty

 विसर्ग सन्धि किसे कहते है? विसर्ग सन्धि के नियम परिभाषा एवं उदाहरण

विसर्ग सन्धि उसे कहते है जहाँ पर विसर्ग के बाद आने वाले स्वर और व्यंजन में कोई विकार हो। अर्थात जब पूर्व पद के अन्त में विसर्ग हो और उत्तर पद के प्रथम में कोई स्वर या व्यंजन हो, तो उनके संयोग जो विकार होगा उसे विसर्ग सन्धि कहते हैं। विसर्ग सन्धि के नियम परिभाषा एवं उदाहरण समझने से पहले विसर्ग और सन्धि शब्द का अर्थ समझते है। विसर्ग  उसे कहते है जो अक्षरों के बाद दो बिन्दु (:) के रूप में लगता है और सन्धि शब्द का अर्थ मेल या संयोग है। सन्धि को पढ़ने/जानने के लिए क्लिक करे। 

विसर्ग सन्धि की परिभाषा 

विसर्गेण सह स्वरव्यञ्जनयोः संयोगेन यः विकारो (परिवर्तनः) भवति सः विसर्ग सन्धिः इति कथ्यते ।
विसर्ग (:) के साथ स्वर और व्यंजन के मिलने पर जो विकार या कोई विकार होता है तो वह विसर्ग सन्धि  कहलाती है। उदाहरण - रामः + च = रामश्च। यहां पर रामः पद का अन्तिम अक्षर विसर्ग (:) है और उत्तर पद मे च है, दोनों के मिलने पर विसर्ग (:) का श् होकर रामश्च शब्द बना। अर्थात पूर्वपद का अंतिम वर्ण विसर्ग (:) है और उत्तरपद का प्रथमपद च है। यहाँ पर विसर्ग के बाद खर प्रत्याहार का च वर्ण होने पर विसर्जनीयस्य सः (खरवसानयोर्विसर्जनीयः) से विसर्ग को सकार आदेश हुआ और  चकार उत्तर में होने के कारण स्तोः श्चुना श्चुः से शकार आदेश होने पर रामश्च शब्द निष्पन्न हुआ।

विसर्ग सन्धि के नियम या सूत्र

विसर्ग सन्धि के नियम या सूत्र - संस्कृत व्याकरण में विसर्गसन्धि के  कुल 13 सूत्र (12 विधिसूत्र तथा 1 परिभाषासूत्र) दिये गये है। इन सूत्रों में विसर्ग सन्धि के नियम बताये गये हैं,  ये सूत्र निम्न प्रकार से हैं - 

    (१)         विसर्जनीयस्य सः ।। 8.3.34
    (२)         वा शरि ।। 8.3.36
    (३)         स - सजुषो रुः।। 8.2.66
    (४)         अतो रोरप्लुतादप्लुते।। 6.1.113
    (५)         हशि च।। 6.1.114
    (६)         भोभगोअघोअपूर्वस्य योऽशि।। 8.3.17
    (७)         हलि सर्वेषाम्।। 8.3.22
    (८)         रोऽसुपि।। 8.2.69
    (९)         रो रि ।। 8.3.14
    (१०)        ढ्रलोपे पूर्वस्य दीर्घोऽणः ।। 6.3.111
    (११)        विप्रतिषेधे परं कार्यम् ।। 1.4.2 
    (१२)        एतत्तदोः सुलोपोऽकोरनञ्समासे हलि।। 6.1.132
    (१३)        सोऽचि लोपे चेत्पादपूरणम्।। 6.1.134

विसर्ग सन्धि के प्रकार/भेद और नियम

विसर्ग सन्धि के प्रकार/भेद और विविध है जिसमे से महत्वपूर्ण प्रकार/भेद निम्नलिखित हैं- 
विसर्ग सन्धि के प्रकार/भेद 

विसर्ग सन्धि के प्रकार/भेद

 

(1) सत्व विसर्ग सन्धि 

 

(2) रुत्व विसर्ग सन्धि 

 

(3) उत्व विसर्ग सन्धि

 

 

(१) सत्व विसर्ग सन्धि - 

सत्व विसर्ग सन्धि का सूत्र - विसर्जनीयस्य सः है जिसकी परिभाषा है - खरवसानयोर्विसर्जनीयः अर्थात खर् प्रत्याहार के परे रहने पर विसर्ग के स्थान पर सकार आदेश होता है और इसी कारण इसे सत्व विसर्ग सन्धि कहते हैं। सत्व विसर्ग सन्धि के नियम और उदाहरण निम्नलिखित है -

    निमय -(१)  -      विसर्ग के बाद यदि क और ख आने पर जिह्वामूलीय होता है तथा प और फ आने पर उपध्मानीय हो जाते हैं। 
    सत्व विसर्ग सन्धि के नियम (१) का उदाहरण - 

    बालः + करोति  = बाल ~ करोति । (:+क/ख=जिह्वामूलीय)

    कृष्णः + पिबति = कृष्ण ~ पिबति। ( : +प/फ= उपध्मानीय)


    नियम (२)  -  विसर्ग के बाद च और छ होने पर विसर्ग के स्थान पर स्तोः श्चुना श्चुः से श्  हो जाता है।

    सत्व विसर्ग सन्धि के नियम (२) का उदाहरण - 
    पशुः + चलति = पशुश्चलति। ( : + च = श्च)
    शठः + छलति = शठश्छलति ( : + छ = श्छ)


    नियम (३) -    विसर्ग के बाद यदि ट और ठ आते हैं तो ष्टुना ष्टुः से षकार आदेश होता है- 
    सत्व विसर्ग सन्धि के नियम (३) का उदाहरण - 
    धनुः + टङ्का = धनुष्टङ्का ( : + ट = ष्ट)
    धूर्तः + ठगति = धूर्तष्ठगति । ( : + ठ = ष्ठ)


    नियम (४)      विसर्ग के बाद त और थ आने पर सकार हो जाता है- 
    सत्व विसर्ग सन्धि के नियम (४) का उदाहरण - 
     रामः + तत्र = रामस्तत्र । ( : + त = स्त)
    नमः + ते = नमस्ते । ( : + ते = स्ते)

रुत्व विसर्ग सन्धि 

रुत्व विसर्ग सन्धि में विसर्ग का रकार आदेश होता है। इस सन्धि का सूत्र है - सराजुषोरूः।  अर्थात पदान्तस्य सस्य सजुषश्च रुः स्यात्।। पद के अन्त में स वर्ण तथा सजुष शब्द के ष वर्ण के स्थान पर रु हो जाता है। रुत्व विसर्ग सन्धि के नियम इस प्रकार से है- 


नियम (१) -    पद के अन्त में सकार और सजुष शब्द को रु हो जाता है। उसके पश्चात रु के उ का लोप होकर र शेष रहता है ।
रुत्व विसर्ग सन्धि के नियम (१) का उदाहरण - 
अग्निस् + अत्र = अग्निरत्र । [ स् + अ = स् का रु और उ का लोप होने पर र शेष)
 

नियम (२) -     यदि विसर्ग से पूर्व अ या आ को छोडकर कोई अन्त्र स्वर आये और बाद में कुचुटुपु वर्ग का तीसरा चौथा और पांचवां या कोई अन्य स्वर या य,र,ल,व वर्ण आता है तो विसर्ग का र हो जाता है।

रुत्व विसर्ग सन्धि के नियम (२) का उदाहरण - 
कवि + गच्छति = कविर्गच्छति । ( यहाँ पर विसर्ग से पहले इ स्वर आया है तथा बाद में वर्ग का तीसरा वर्ण ग आया है इसलिए विसर्ग का र हो गया।)


उत्व विसर्ग सन्धि 

विसर्ग से पहले अप्लुत अकार और बाद में भी अकार  होने पर विसर्ग को उ (ओ) हो जाता है। उत्व विसर्ग सन्धि का सूत्र है - अतो रोरप्लुतादप्लुते।। 


निमय (१) -    अप्लुत अकार विसर्ग से पहले है और उसके बाद भी अ है तो विसर्ग के स्थान पर आदेश रू का उ हो जाता है ।
उत्व विसर्ग सन्धि के नियम (१) का उदाहरण - 
बालः + अस्ति = बलोऽस्ति। 
यहाँ पर बालः शब्द के लकार में अ विसर्ग (:) से पहले है और अस्ति का अ विसर्ग के बाद है अतः विसर्ग का रू  (उ) होकर अ +उ को आदगुणः से गुण होकर ओ होकर तथा बाद वाले अ का पूर्वरूप सन्धि होने से बलोऽस्ति रूप बना।

विसर्ग सन्धि के उदाहरण

        (१)     कः + तनोति = कस्तनोति ।

        (२)     गुरोः + आदेशः = गुरोरादेशः ।

        (३)     क: + अपि = कोऽपि ।

        (४)      शिवः + अर्च्यः = शिवोऽर्च्यः ।

        (५)     कृष्ण + छात्रः = कृष्णश्छात्रः ।

        (६)     पयः + शीतलम् = पयश्शीतलम् ।

        (७)     धेनुः + गच्छति  धेनुर्गच्छति ।
    
        (८)     पुनः + अत्र = पुनरत्र ।

        (९)     ततः + ततः = ततस्ततः।

        (१०)     राम: + च = रामश्च 


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