संज्ञा-प्रकरणम् / संज्ञा-सूत्राणि/ Sangya-Prakaranam laghusidhant kaumudi


संज्ञा-प्रकरणम् / संज्ञा-सूत्राणि (लघुसिद्धान्त कौमुदी के अनुसार)

संज्ञा क्या है? - सम्+ ज्ञा = सही अर्थ का ज्ञान करने वाला| सामान्यतः नाम को संज्ञा कहते हैं। यथा- राम, श्याम, मोहन आदि। 'संज्ञायतेऽनया इति संज्ञा' इस व्युत्पत्ति के अनुसार, जिस पदार्थ-बोधक विशेष शब्द ज्ञान कराया जाये या चाहे उसे परिभाषित किया जाये या नहीं वह संज्ञा कहलाता है। नाम को संज्ञा तथा नाम वाले को संज्ञी या संज्ञक कहते हैं।
संज्ञा-सूत्र क्या है? - संज्ञाओं का विधान करने वाले सूत्र संज्ञा-सूत्र कहलाते हैं। ज्यादा से ज्यादा विषय को संक्षेप में कहना सूत्र कहलाते हैं। यथा - वृद्धिरादैच्। (1.1.1) अर्थात यह वृद्धि संज्ञा का सूत्र है जो कहता है कि आत और ऐच् की वृद्धि संज्ञा होती है।

लघुसिद्धान्त कौमुदी के अनुसार संज्ञा-प्रकरणम् / संज्ञा-सूत्रम्

अ इ उ ण् आदि चतुर्दश अर्थात चौदह  माहेश्वर-सूत्र है, जो अण् आदि की संज्ञा के लिए हैं अर्थात प्रत्याहार सिद्धि के लिए हैं - इति माहेश्वराणि सूत्राण्यणादिसंज्ञार्थानि। 

एषामन्त्या इतः -  इन चतुर्दश माहेश्वर सूत्र के अन्त्य अर्थात अन्तिम वर्ण की इत् संज्ञा होती है।

इत्संज्ञा-विधायकं संज्ञा-सूत्रम्

१. हलन्त्यम्।।1.3.3।।  

हल् अन्त्यम् इति अर्थात् हल् पदों अर्थात अक्षरों की इत्संज्ञा होगी। कैसे?

उपदेशेऽन्त्यं हलित्स्यात्।

उपदेशे, अन्त्यम्, हल्, इत्, स्यात्। अर्थात् उपदेश अवस्था में हल् प्रत्याहार के अन्तिम वर्ण या अक्षर की इत् संज्ञा होती है।

उपदेश किसे कहते हैं?

उपदेश आद्योच्चारणम्। आदि या प्रथम उच्चारण को उपदेश कहते हैं। अर्थात् पाणिनि, कात्यायन और पतञ्जलि द्वारा जिनका प्रथम पाठ किया गया या सबसे पहले उच्चारण किया गया वह उपदेश है। गम् आदि धातु, अइउण् आदि सूत्र, उणादिसूत्र, वार्तिक, लिङ्गानुशासन, आगम, प्रत्यय और आदेश यह सब उपदेश कहलाते हैं। यथा-

धातुसूत्रगणोणादिवाक्यलिङ्गानुशासनम्।

आगमप्रत्ययादेशा उपदेशाः प्रकीर्तिताः।।

लोप-संज्ञा-विधायकं संज्ञा-सूत्रम्

२. अदर्शनं लोपः।। 1.1.60।।

प्रसक्तस्य अदर्शनं लोपसंज्ञं स्यात्।

न दिखाई देना अर्थात् पहले रहने वाले का बाद में नहीं दिखाई देना और न सुनाई देना अदर्शन है और उसकी लोप संज्ञा होती है।

लोप-विधायकं विधि- सूत्रम्

३. तस्य लोपः।। 1.3.9।।

उसका लोप हो। किसका?

तस्येतो लोपः स्यात्। णादयोऽणाद्यर्थाः।

उस इत् संज्ञक वर्ण का लोप होता है। अर्थात् अइउण् ऋलृक् आदि माहेश्वर सूत्र में जो ण्, क् आदि अन्त्य वर्ण हैं उनकी इस सूत्र से इत् संज्ञा होती है।

प्रत्याहार-संज्ञा-विधायकं संज्ञा-सूत्रम्

४. आदिरन्त्येन सहेता।।1.1.71।।

अन्त्येनेता सहित आदिर्मध्यगानां स्वस्य च संज्ञा स्यात्।

यथाऽणिति अइउवर्णानां संज्ञा। एवमच्हल्अलित्यादयः।

आदि और अन्त्य या अन्तिम वर्ण के साथ उच्चारित मध्यम और स्व या अपना बोध होना, प्रत्याहार संज्ञा होती है। अर्थात् अन्त्य या अन्तिम इत् संज्ञक वर्ण के साथ आदि अर्थात् प्रथम वर्ण या अक्षर का उच्चारित होना प्रत्याहार संज्ञा कहलाता है।

यथा - यथाऽणिति अर्थात् अण् प्रत्याहार में अ,इ,उ का बोध होना अर्थात् इसमें 'अ' का अपना और इ, उ मध्य वर्ण का भी बोध होता है। अर्थात् अण् प्रत्याहार से अ,इ,उ इन तीनों वर्णों का बोध होता है। ण् हलन्त्यम् होने के कारण उसकी इत् संज्ञा हुई तथा अदर्शनं लोप से अदर्शन होकर तस्य लोपः से लोप हुआ। जिस कारण ण् का बोध नहीं होता है, वह केवल प्रत्याहार की सिद्धि के लिए प्रयोग किया जाता है।

ह्रस्व-दीर्घ-प्लुत-संज्ञाविधायकं संज्ञा-सूत्रम्

५. ऊकालोऽज्झ्रस्वदीर्घप्लुतः।।1.2.27।।

उश्च, ऊश्च, उ३श्च वः, वा कालं इव कालो यस्य सोऽच् क्रमाद् ह्रस्व-दीर्घ-प्लुत-संज्ञः स्यात्। स प्रत्येकमुदात्तादिभेदेन त्रिधा।

उकार एक-मात्रिक, ऊकार द्वि-मात्रिक और उ३कार त्रि-मात्रिक के उच्चारण काल के समान तथा उसी प्रकार उच्चारण वाले अचों की क्रमशः ह्रस्व-संज्ञा, दीर्घ-संज्ञा और प्लुत-संज्ञा होती है। यह अच् उदात्त, अनुदात्त और स्वरित तीन प्रकार के होते हैं।

उदात्त-संज्ञाविधायकं संज्ञा-सूत्रम्

६. उच्चैरुदात्तः।।1.2.29।।

उच्चारण-स्थान अर्थात् कण्ठ-तालु आदि के उपरी भाग से उच्चारित अच्(स्वर) की उदात्त-संज्ञा होती है।

अनुदात्त-संज्ञाविधायकं संज्ञा-सूत्रम्

७.  नीचैरनुदात्तः।।1.2.30।। 

उच्चारण-स्थान अर्थात् कण्ठ-तालु आदि के नीचले या निम्न भाग से उच्चारित अच्(स्वर) की अनुदात्त-संज्ञा होती है।

स्वरित-संज्ञाविधायकं संज्ञा-सूत्रम्

८. समाहार: स्वरित:।।1.2.31।।

अच्(स्वर) की स्वरित संज्ञा वहां होती है जहाँ पर उदात्त और अनुदात्त दोनों बराबर की स्थिति में हो। 

अनुनासिक-संज्ञाविधायकं संज्ञा-सूत्रम्

९. मुखनासिकावचनोऽनुनासिकः।।1.1.8।।

मुख-सहित-नासिकयोच्चार्यमाणो वर्णोऽनुनासिकसंज्ञः स्यात्।

मुख और नासिका से एक साथ उच्चारित होने वाले वर्ण या अक्षरों की अनुनासिक संज्ञा होती है। यथा- अँ, इँ, उँ आदि) यहाँ ङ्, ञ्, ण्, न्, म् व्यंजन वर्ण होने पर भी अनुनासिक वर्ण हैं। यहाँ एक बात ध्यान देने योग्य है कि, जो अनुनासिक(मुख और नाक से उच्चारित वर्ण) नहीं हैं वे अननुनासिक या निरनुनासिक कहलाते हैं।

तदित्थम् - अ-इ-उ-ऋ एषां वर्णानां प्रत्येकमष्टादश भेदाः।

अ,इ,उ,ऋ इन वर्णों के अठारह भेद हैं। (ह्रस्व,दीर्घ, प्लुत भेद से)

लृवर्णस्य द्वादश, तस्य दीर्घाभावात्।  एचामपि द्वादश, तेषां  ह्रस्वाभावात्।

लृ वर्ण के बारह भेद होते हैं, क्योंकि लृ वर्ण की दीर्घ मात्रा नहीं होती है तथा ऐच् (ऐ,औ,) की ह्रस्व मात्रा नहीं होने के कारण बारह भेद होते हैं।

सवर्ण-संज्ञाविधायकं संज्ञा-सूत्रम्

१०. तुल्यास्यप्रयत्नं सवर्णम्।।1.1.9।।

ताल्वादिस्थानमाभ्यान्तरप्रयत्नश्चेत्येतद्द्वयं यस्य येन तुल्यं तन्मिथः सवर्णणसंज्ञं स्यात्।

तालु आदि उच्चारण स्थान और आभ्यन्तर आदि प्रयत्न जिस वर्ण का जिस वर्ण से तुल्य हो वहाँ पर सवर्ण संज्ञा होती है। अर्थात् जहाँ पर दो वर्ण  समान उच्चारण स्थान और समान आभ्यन्तर आदि प्रयत्न वाले हो वहाँ पर सवर्ण संज्ञा होती है। जैसे - क और ख दोनों वर्णों का उच्चारण स्थान कण्ठ है तथा दोनों का स्पृष्ट-प्रयत्न है। यहाँ पर क और ख दोनों वर्णों का स्थान और प्रयत्न समान है अतः दोनों की सवर्ण संज्ञा होती है।

वार्तिक

ऋलृवर्णयोर्मिथः सावर्ण्यं वाच्यम्।

कात्यायन जी ने यहाँ पर यह वार्तिक बनाकर ऋ और लृ वर्ण की आपस में सवर्ण संज्ञा की है। अर्थात् ऋ और लृ की आपस में सवर्ण संज्ञा होती है। 

'अ' आदि-संज्ञाविधायकं संज्ञा-सूत्रम्

११. अणुदित्सवर्णस्य चाप्रत्ययः।।1.1.69।।

अप्रत्यय अण् और उदित्  ये सवर्ण ग्राहक होते हैं। अर्थात्

अविधीयमानोऽणुदिच्च सवर्णस्य संज्ञा स्यात्।

अविधीयमान अर्थात् जहाँ विधेय नहीं हो वहाँ पर अण प्रत्याहार वर्ण से उसके अन्य सवर्णों का भी ग्रहण किया जाता है। यथा इको यणचि में इक प्रत्याहार के इ,उ,ऋ, के साथ साथ इक् के अन्य सवर्ण ई,ऊ,ऋ आदि ह्रस्व, दीर्घ, प्लुतादि अठारह भदों का भी ग्रहण किया जाता है। अर्थात्  यहां पर यदि स्थान और प्रयत्न की समानता से कोई वर्ण आता है और वह अण प्रत्याहार में आता है तो वे अपने सर्वण के ग्राहक या बोधक होते हैं।

अत्रैवाण् परेण णकारेण। इस सूत्र में लण् वाले णकार को स्वीकार किया गया है।

प्रतीयते विधीयत इति प्रत्ययः। जिनका विधान किया जाता है उसे प्रत्यय कहते है और जिनका विधान नहीं किया जाता है उन्हें अप्रत्यय कहा जाता है।

कुचुटुतुपु एते उदितः। कु, चु, टु, तु, पु ये उदित् हैं। इन पांचों की ही प्राचीन आचार्यों ने उदित् संज्ञा की है।

संहिता-संज्ञाविधायकं संज्ञा-सूत्रम्

१२. परः सन्निकर्षः संहिता।। 1.4.109।।

वर्णानामतिशयितः सन्निधिः संहितासंज्ञः स्यात्।

वर्णों की अत्यधिक समीपता संहिता संज्ञा कहलाती है। अर्थात् संहिता संज्ञा वही होगी जहाँ सन्धि वाले वर्ण आपस में अत्यधिक समीप हो यथा कृष्ण +अवतार यहां पर णकार का अ और अवतार के अ में अत्यंत समीपता होने के कारण दोनों अकारों में संहिता संज्ञा होगी।

संयोग-संज्ञाविधायकं संज्ञा-सूत्रम्

१३. हलोऽनन्तराः संयोग।।1.1.7।।

अज्भिरव्यवहिता हलः संयोग-संज्ञाः स्युः।

अचों से अव्यवहित हल्  की सयोग संज्ञा होती है। अर्थात् दो या दो से अधिक हल् वर्णों के बीच में अच् का न होना संयोग संज्ञा है। यथा-  सिद्ध पद में द् और ध् के बीच में कोई अच् (स्वर) नहीं है अतः यहाँ पर संयोग संज्ञा है।

पद-संज्ञाविधायकं संज्ञा-सूत्रम्
१४. सुप्तिङन्तं पदम्।।1.4.14।।

सुबन्तं तिङन्तं च पदसंज्ञं स्यात्।

सुबन्त (सु,औ,जस्) और तिङन्त (तिप्, तस्, झि) की पद संज्ञा होती है। 

संज्ञा-प्रकरणम् / संज्ञा-सूत्राणि
संज्ञा-प्रकरणम् / संज्ञा-सूत्राणि

।।इति लघुसिद्धान्तकौमुद्यनुसारं संज्ञा-प्रकरणं समाप्तम्।। 
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